Thursday, March 17, 2011

बुत सिसकते है

३१ जनवरी २०११ के दैनिक ट्रिबुन के अंक में प्रकाशित मेरी कहानी


रमेश चहल

उत्तरी भारत के प्रदेशों में से किसी एक का छोटा-सा जिला, जहां रात अपनी साढ़े बारह बजे के बाद की जिंदगी आवारा कुत्तों, चोर, उचक्कों, चौकीदारों और यदा-कदा पुलिस के गश्ती दल के साथ काटती है। सुबह तीन से चार बजे तक भद्रजन भी रेलगाड़ी या बस पकडऩे के लिए तेज-तेज चलते दिखते हैं, पर वे खुले आसमान के नीचे अधिक देर तक नहीं टिक पाते। खुले आसमान एवं उनके मध्य बस एवं रेलगाडिय़ों की सुरक्षित छतें आ जाती हैं और वे अपने गंतव्य की ओर भागते नजर आते हैं। पिछले 40-50 वर्षों से इस शहर में यही हो रहा है। शहर के चौराहे पर खड़ी दो मूर्तियां इसकी पक्की गवाह हैं। इस शहर के पता नहीं कितने राज उनके पथरीले सीनों में दफन हैं। उनकी पाचन क्षमता ज्यादा है या उनको बनाने वाले ने जीभ नहीं बनाई ये तो पता नहीं, पर आज तक उन्होंने अपनी जुबान नहीं खोली। बस रात को ही तन्हाई मिटाने की गर्ज से कभी-कभी आपस में बतिया जरूर लेती हैं। नींद तो इनसे कभी मिलने ही नहीं आई। न आज और न आज से 70-80 वर्ष पहले जब ये जुबान खोला करते थे। दोनों में फासला यही कोई 20-25 मीटर के आसपास होगा। असंख्य नासूरों के साथ सीना ताने बिन हाथों वाले इन बुतों की व्यथा इन्हीं के माध्यम से सुनना ज्यादा सही रहेगा।
‘क्यों पंडित जी! आज कुछ उदास-से लग रहे हो?’ समांतर दिशा में मुंह किए हेट वाली पहली मूर्ति ने दूसरी को टोका।
‘हूं…हां… कैसे हो भगते!’ किसी गहन मुद्रा से जागते हुए दूसरी मूर्ति बोली।
‘यही प्रश्न तो मैंने आपसे ही पूछा था, आपने जवाब दिया?’
‘…हां और सुना…।’
‘अभी तक सुनाया ही क्या है?’ दोनों हंस पड़ी।
‘भगते…! यार मैं सोच रहा हूं कि हम कभी आजाद भी होंगे?’
‘मतलब… हम आजाद नहीं हैं। फिर क्यों अपने नाम के पीछे आजाद-आजाद लगाए घुमा करते थे’ कहकर पहली मूर्ति हंसने लगी।
‘भगते कभी तो गंभीर रहा कर…। मैं अपनी बात नहीं कर रहा, अपने देश की बात कर रहा हूं।’ दूसरी मूर्ति वास्तव में ही गंभीर दिख रही थी।
‘क्यों क्या हुआ देश को…? 1947 में आजाद तो हो गया था।’
‘अनजान मत बन। आजादी किसे कहते हैं ये मुझसे बेहतर जानता है तू।’ दोनों के बीच चुप्पी आ गई थी। थोड़ी देर बाद भगते की मूर्ति बोली, ‘यूं दिल दुखाने से कुछ नहीं होगा पंडित जी, बस अब तो चुपचाप देखते जाइए।’
‘क्यों कुछ नहीं होगा? हम मर चुके हैं मगर हमारी विचारधारा तो जिंदा है अभी। फिर क्रांति…।’
‘किस विचारधारा की बात करते हो पंडित जी? इस देश के नौजवान, जो खुद को क्रांतिकारी कहते हैं उन्हें लेनिन, माक्र्स और माओत्से जैसे लोगों की विचारधारा पसंद है। घर की मुर्गी दाल बराबर तक सिमेट दिया गया है हमें।’ स्वर में थोड़ी-सी कम्पन आ गई थी।
‘शायद तू सही है भगते पर…।’
‘हम गलत ही कब थे पंडित जी! यहां तो फांसी तक को भी लोगों में इंकलाब लाने का जरिया बनाया था और आज?’
‘नहीं भगते! शायद यही हमारी भूल थी। हम तो जोश में आकर शहादत की चादरें ओढ़ते रहे मगर पीछे ऐसे लोगों को छोड़ते रहे जो कायर थे। उन्होंने हमें क्या दिया? क्रांतिकारी की जगह एक आतंकवादी की उपाधि। आज लगता है कि हमने अपनी जवानी यूं ही खो दी।’
‘हमारी भूल नहीं थी पंडित जी। हम तो इंकलाब चाहते थे और इंकलाब आया भी, पर लोग उसे संभाल नहीं सके। अनुभव विहीन चमचों के हाथों में देश की बागडोर सौंपकर देशवासियों ने इसे ही आजादी समझ लिया और उसका परिणाम विभाजन के रूप में पहले दिन ही सामने आ गया। … अब सोचता हूं कि अच्छा हुआ मैं फांसी पर लटक गया वरना लायलपुर से इधर पंजाब की तरफ आते हुए किसी दंगाई के हाथों मारा जाता या अपने ही मुल्क में शरणार्थी की जिंदगी जीने पर मजबूर होता मैं!’ हेट वाली मूर्ति की बातों से दर्द बाहर आने लगा था।
‘और मैं आज अपने पोतों को आरक्षण के लिए सरकारों से लड़ते देखता हूं न! इन बातों का कोई फायदा नहीं भगते! जब मुल्क ही ऐसे हाथों में चला गया जो पैसे के लिए अपनी मां का भी सौदा कर सकते हैं, उन लोगों से उम्मीद ही क्या लगाई जा सकती है।’ सांत्वना के लिहाज से दूसरी बोली।
‘भारत मां ने बेटे जनने बंदकर दिए हैं पंडित जी! अब तो शहादत पर भी उंगलियां उठने लगी हैं। नेता जी के बलिदान को पूरा विश्व जानता है, पर हद है कि हमारे ही देश को चलाने वाला मंत्री कहता है कि नेताजी का स्वतंत्रता आंदोलन में कोई योगदान नहीं!’ हेट वाली मूर्ति की आंखों का दर्द और बढ़ गया था।
‘पूरी दुनिया को पता है कि बंगाल के इस नौजवान ने पूरी ब्रिटिश सरकार को हिलाकर रख दिया था और मृत्योपरांत भी देशवासी यही आस लगाए रहे कि नेताजी जिंदा हैं और जरूर आयेंगे। इस दिशाहीन हो चुकी राष्ट्र की बागडोर संभालने और ये कहते हैं कि …?’ पंडित जी की मूर्ति का चेहरा लाल हो गया, उसकी मूंछें फड़कने लगी थीं।
‘इनसे पूछने वाला हो कि गरहम आतंकवादी थे और नेताजी भी यूं ही घूमते रहे तो फिर फिरंगियों को देश से किसने निकाला? इतने अहसान फरामोश हो जाएंगे लोग कभी कल्पना भी नहीं की थी पंडित जी।’ हेट वाली मूर्ति का दर्द बढ़ता ही जा रहा था।
‘आज वही नेताजी बाजू वाले चौराहे पर चौकीदार बने खड़े हैं। उनकी सार संभाल तक कोई नहीं ले रहा। बहुत अच्छा सिला मिलता है यहां कुर्बानी का!’ दूसरी मूर्ति व्यंग्य पर उतर आई थी।
काफी देर तक दोनों के बीच चुप्पी छाई रही। फिर हेट वाली मूर्ति बोली – ‘पंडित जी! कई बार तो मेरा दिल करता है कि मैं फिर जन्म लूं और फिर इंकलाब लाऊं…। आजादी की परिभाषा की व्याख्या मैं स्वयं करूं!’
‘कभी गलती मत करना भगते! बस यहीं खड़े तमाशा देखता रह।’
‘क्यों पंडित जी? इंकलाब लाना है, उसमें क्या कठिनाई है? फिर कुर्बानी ही तो देनी है, कौन-सा मुश्किल काम है अपने लिए?’
‘अफसोस भगत! तू वास्तविकता से इतना दूर है!’
‘मतलब?’
‘मतलब ये कि किसके खिलाफ लाएगा इंकलाब? आलसी, भ्रष्ट और मुफ्तखोर हो चुकी जनता के खिलाफ या अपराधियों से मंत्री बने लोगों के खिलाफ। हर कोई स्वार्थी है भगते। कुछ नहीं होने वाला इस देश का।’
‘गुलामी की बेडिय़ों में जकड़े राष्ट्र में भी आजाद शब्द का इस्तेमाल बेधड़क करने वाले मुंह से इस तरह की उम्मीद नहीं थी पंडित जी!’
उम्मीद तो इन हालातों की हमें भी नहीं थी भगते! आजादी की हवा में सांस लेने की तमन्ना दिल में लिए मरे थे हम। वह तमन्ना आज भी तमन्ना ही रह गई। आज कष्ट होता है उस फैसले को यादकर जब क्रांतिकारी बनने की सोची थी। क्रांतिकारी तो बन नहीं पाया, पर सत्तासीन लोगों ने आतंकवादी जरूर बना दिया। गर फिरंगियों को भयभीत करना ही आतंकवाद की श्रेणी में आता है तो थे हम आतंकवादी, पर जनता को भयभीत करने वालों की श्रेणी में क्यों रख जा रहा है?’ दर्द का दरिया दूसरी मूर्ति की आंखों से छलकने लगा था।
‘आप टूट चुके हो पंडित जी!’
‘तो फिर तू कौन-सा साबुत बचा है!’
‘नहीं पंडित जी! शहादत के बदले शोहरत के सपने हमने नहीं देखे थे!’
‘तो फिर ये सपने भी नहीं देखे कि हमारी आंखों के आगे लोग आपस में कट-कट मरें और सत्ता-सीन लोग उनकी मौत पर आंसुओं की जगह ठहाके लगाएं। देश की नदियों के निर्मल जल में रक्त का मिश्रण हमने नहीं सोचा था कभी। भारत मां की दर्द भरी आहें आजादी के बाद भी सुनने को मिलेंंगी, कभी कल्पना भी की थी हमने?’
‘गर सारे सपने सच होने लगें तो फिर मानव भगवान न बन जाए, पंडित जी!’
‘रोना तो इसी का है, भगते! हमने जो चाहा वह नहीं हुआ और जो राजनीतिज्ञ चाहते हैं वह हो जाता है। सोचता हूं काश! हम भी राजनीतिज्ञ होते और लोग हमारी भी मान लेते।’ पंडित जी ने ठंडी आह भरी।
‘आप राजनीतिज्ञ होते तो आपके दामन पर क्या पता कितने दाग होते। राजनीति और ईमानदारी का छत्तीस का आंकड़ा शुरू से ही है पंडित जी! आज हम बेदाग हैं तो इसी कारण कि हम राजनीतिज्ञ नहीं थे!’
‘फिर भगते! लोगों को कौन समझाएगा? कौन इंकलाब लाएगा?’
‘शायद कोई नहीं, पंडित जी! इंकलाब की हवा तो जा चुकी। रह गए बस पागल और मूर्ख लोग जो अपनी चाल में नहीं भेड़चाल में विश्वास रखते हैं। राष्ट्र की सफाई में हाथों को गंदा कोई नहीं करना चाहता।’
‘पागल और मूर्ख लोग। वाह! क्या संज्ञा दी है तूने भारतवासियों को, बात में दम है।’
‘हम भी भारतवासी हैं पंडित जी!’
‘ तो क्या हम भी भगते…?’
‘हां पंडित जी हम भी…।’ आवाज थोड़ी रूंध गई थी।
‘शायद तू सही है भगते! मुझे भी कभी-कभी लगता है कि मैं भी नाहक ही…। इन लोगों से तो फिरंगी अच्छे थे यार!’ आवाज में कम्पन भी थी।
‘धर्म व जात के नाम पे लडऩे के सिवा जानते ही क्या हैं हम पंडित जी? आजादी से पहले मुस्लमानों से नहीं बनी। मेरे पंजाब के टुकड़े हो गए और हिंदुस्तान के सीने को काटकर पाकिस्तान बनाया गया। दंगों का सिलसिला फिर भी नहीं रुका। फिर हिंदू-सिख भी आपस में मिलकर नहीं रह सके।’ भगत नामक बुत शून्य में निहारता हुआ खामोश हो गया था।
‘1983 के दंगे मुझे आज भी याद हैं भगते! जब प्रदर्शनकारियों ने तेरे गले में जलता टायर फेंका था और मेरे गले में फूलों की मालाएं डाली थीं। सालों ने हमें भी नहीं बख्शा। यहां भी बांटने चल पड़े थे…।’ साथ ही दायीं आंख की ओर से पानी की बूंद बह निकली थी जो गालों से होती हुई मूंछों पर जा अटकी थी।
‘हिंदू-सिखों की छोडिय़े पंडित जी! यहां तो सिख ही आजकल आपस में भिडऩे को फिर रहे हैं। मुझे लगता है पंजाब को कोई अदृश्य शाप है जो इसे शुरू से ही बसने नहीं देता। जब कोयलें बोलने लगती हैं तो धर्म का प्रतिनिधित्व करने वाले कौवों को रास नहीं आता और कोयलों को कत्ल कर दिया जाता है। मेरा पंजाब बसदा पंजाब नहीं उजड़ता पंजाब बन गया है पंडित जी!’ भगते की दोनों आंखों से नीर निरंतर बहने लगा था।
‘आह…! मेरा देश…! मेरा भारत…! काश…! हम ही तेरा भविष्य संवार पाते।’ आंसू इधर भी निरंतर बह रहे थे।
‘सुबह होने वाली है पंडिज जी।’ भगते ने खुद पर काबू करते हुए चेताया।
‘तो फिर… कोई नया थोड़े ही होगा। सुबह के बाद दोपहर, फिर शाम और फिर रात…। रात को फिर सन्नाटा और सन्नाटे में जागते हम दो आतंकवादी…।’ पानी भरी आंखों में पीड़ा एवं व्यंग्य का मिश्रण भी चमक रहा था।
दोनों मूर्तियां सावधान मुद्रा में पहले की तरह समांतर चुपचाप उदासी लिए खड़ी थीं। सुबह अखबार बांटने वाले साइकिल पर दौड़ रहे थे, फिर सब्जी मंडी से सब्जी-फल खरीद कर लोग रेहडिय़ां, सजाने लगे। रिक्शा, आटोरिक्शा गाडिय़ां फिर धूल उड़ाने व धुआं छोडऩे में मशगूल हो गई थीं। शहर में शोर पल-पल बढ़ता जा रहा था। इन्हीं के बीच चौराहों पर खड़ी उन मूर्तियों के उन चेहरों की ओर देखने का समय किसी के पास नहीं था जिन पर रेत की एक नयी तह आज फिर जमने लगी थी। रेत से सनी इन मूर्तियों को देखकर कोई नहीं सोच सकता था कि रात के सन्नाटे में ये बुत सिसकते भी हैं।
- गांव हरिपुरा, जिला व तहसील कैथल

Tuesday, March 1, 2011